Search This Blog

Tuesday, June 16, 2009

आनन्दमय जीवन by शिवानन्द (26)

यह संसार बड़ा विचित्र है तथा मनस्वी पुरुष सावधान रहकर ही कर्तव्य-पथ पर आगे बढ़े सकता है। जन-समाज में मनुष्य के रूप में अथवा आकृति में अनेक विषैले सर्प और बिच्छू जो अकारण काट लेते हैं, भेड़िये और सियार जो हिंसा द्वारा दुर्बल जन को अपा खाद्य बना लेने की घात में इधर-उधर धूमते हैं, गृद्ध और काक जो सदा परधन पर अपनी कुटिल दृष्टि लगाए रहते हैं पग-पग पर मिलते हैं। रूप अथवा आकृति की समानता होते हुए भी मनुष्य और मनुष्य के स्वभाव में बहुत अन्तर होता है। कुछ लोग उस सर्प के सदृश कृतघ्न होते हैं जो दूध पिलाने पर विष उगलता है तथा कुछ अन्य उस गौ की भाँति सरल है जो घास खाकर दूध देती है। कुछ लोग सिंह के सदृश्य साहसी वीर होते हैं तथा कुछ लोग श्रृगाल की भाँति कायर और चालाक होते हैं। इस समाज में पग-पग पर ऐसे लोग मिलते हैं जो बिना कारण दूसरों का अहित करने में अपना हित तथा दूसरों को दुःख देने में अपना सुख मानते हैं। अनेक लोग स्वार्थ से प्रेरित होकर कर्म करते हैं तथा सफलता होने पर उपकारी जन के प्रति कृतघ्न होकर, निर्लज्ज रूप में सामने खड़े हो जाते हैं। यद्यपि सभी में गुण और दोष होते हैं तथापि कुछ मनुष्यों में गुण और दोष की मात्रा में अत्यधिक विषमता होती है। गुणों के प्राधान्य के कारण मनुष्य उत्तम अथवा श्रेष्ठ तथा दोषों के प्राधान्य होने के कारण अधम अथवा निकृष्ट कहलाता है। विवेकशील पुरुष संसार को बुरा कहकर नहीं कोसता तथा किसी से घृणा अथवा वैर भी नहीं करता। वह भी मिल-जुलकर और सभी का सहयोग लेकर जीवन-पथ पर आगे बढ़ता रहता है। वास्तव में संसार को बदल देने की प्रक्रिया का प्रारम्भ भी स्वयं को बदलने से होता है।
जीवन की कृतार्थता जीवन की रक्षा करने में तथा चारों ओर आशा और उत्साह का संचार तथा सुख और शान्ति का प्रसार करने में है। हँसना और हँसाना जिन्दी है, रोना और रुलाना पशुता है। धर्म के नाम पर विधर्मियों को लूटना तथा उनकी मारकाट करना धर्मगुरुओं तथा धर्मग्रन्थों पर कलंक है। धर्म के नाम पर हिंसा भड़कानेवाले लोग शैतान के दूत होते हों। हिंसा प्रतिशोध से शान्त नहीं होती। बदला लेने की भावना से प्रेरित होकर हिंसा की होड़ करने से हिंसा का क्रम टूटता ही नहीं तथा हिंसा की आग फैलकर समूचे समाज को नष्ट कर देती है। शैतान लोग धर्म को बचाने के नाम पर धर्म की हत्या करते हैं तथा सारे समाज को ले डूबते हैं। विवेकशील पुरुष सबको भली प्रकार पहचानता है किन्तु वह अपने व्ववहार में यथासंभल प्रेम और सद्भावना का परित्याग नहीं करता। वह साँप और बिच्छू की प्रकृतिवाले लोगों को पहचानता है तथा उनसे सावधान बपी रहता है किन्तु यथासंभव वह व्यक्तिगत झगड़ों और मुकद्मों में पड़कर अपने समय और शक्ति का क्षय नहीं करता। वह तुच्छ बातों में सिद्धांत और प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर समस्याओं को जटिल नहीं बनाता और सम्मानजनक समझौते का अवसर आते ही झगड़े को निपटा लेता है। मित्रों की संख्या बढाने और शत्रुओं की संख्या घटाने से तथा अपने चारों ओर सौमनस्य और सद्भावना का वातावरण सृजित करने से जीवन-रथ निर्बाध रूप से प्रगति के पथ पर आगे बढ़ता रहता है।
विवेकशील पुरुष आलोजकों और निन्दकों का भी कृतज्ञ होता है क्योंकि वे हर समय पहरेदार बनकर उसे जगाते हैं और संभावित खतरों की सूचना देकर सावधान रखते हैं। अनभिज्ञता के कारण अर्थात् तथ्यों को न जानने के कारण तथा ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित आलोजना को भी परखकर उसकी उपयोगिता पर विचार करना चाहिए। किंतु आलोचना को शूल मानकर संत्रास अनुभव करना विवेकहीनता है। समझदार व्यक्ति विध्वंसात्मक वृत्तिवाले (निगेटिव) लोगों को भी जानता और पहजानता है जो दूसरों को फँसाने के लिए जाल बिछाने में ही अपनी कृतार्थता समझते हैं किन्तु कालान्तर में ऐसे लोग स्वयं ही अपने जालों में फँस जाते हैं तथा उन गड्ढ़ों में गिर जाते हैं जिन्हें वे दूसरों के लिए खोदते है।
विवेकशील पुरुष न केवल क्रिया में उत्तम होता है बल्कि प्रतिक्रिया में भी यथासंभव उत्तम ही रहता है। यदि कोई झगड़ा सिर पर थोप ही दिया जाए तदो विवेकशील पुरुष साहसपूर्वक परिस्थिति का सामना करता है। वास्तव में विजय अथवा पराजय होना इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना साहसपूर्वक दुष्टता का प्रतिरोध करना है। विवेकशील पुरुष कभी अपने मन में पराजय नहीं करता। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। पराजय स्वीकार न करके आगे बढ़ते रहनेवाले पराक्रमी पुरुष मानवता के प्रकाशदीप बन जाते है।

No comments:

Post a Comment